जनमुद्दा विशेष

खैरागढ़ के विकास में राजनीति हाशिए पर, सामाजिक संगठनों ने संभाला मोर्चा

खैरागढ़ के विकास में राजनीति हाशिए पर, सामाजिक संगठनों ने संभाला मोर्चा

Date : 30-Oct-2020

 

0 पांच साल के लिए चुनकर आए जनप्रतिनिधि सरकारी पैसों के भरोसे, सामाजिक संगठन अपने बूते पर बदल रहे खैरागढ़ की तस्वीर 

खैरागढ़। छोटे—छोटे कार्य जिनके लिए महीनों कागजी कार्रवाई के इंतजार के बाद लाखों रूपए फूंके जाते हैं, वह अब चंद रूपयों में जनसहयोग और श्रमदान से पूरा हो रहा है। सौदर्यीकरण, पौधारोपण, मानव सेवा, गो—सेवा समेत शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को भी संवारने का जिम्मा आम जनता ने उठा लिया है। खासकर युवा पीढ़ी बढ़—चढ़कर सामने आ रही है। पिछले डेढ़ सालों में शहर सकारात्मक विकास की ​दिशा में बढ़ रही है। खुशी की बात यह है कि इसका नेतृत्व जनता खासकर युवा कर रहे हैं। 

    राजनीति पीछे छूट रही है। सेवाभाव जीतता नजर आ रहा है। जी हां, भाव...... वही भाव जिसके होने से जागरूक जनता एकजुट हो जाती हैं। वही भाव जिसके होने से नेताओं और अधिकारियों के आश्वासन का इंतजार नहीं करना पड़ता। मुट्ठीभर लोग मिलते हैं, आपसी विमर्श करते हैं। मौखिक योजनाएं तैयार होती है। एक राय होकर निर्णय लिया जाता है और काम शुरू हो जाता है। इन्ही कार्यों के लिए जनप्रतिनिधि मांग पत्र पेश करते हैं. प्रस्ताव बनाया जाता है, प्रशासनिक, तकनीकी. वित्तीय स्वीकृति होती है। टेंडर जारी होता हैं। चहेते ठेकेदारों को उपकृत किया जाता है। कमीशन और हिस्सेदारी तय की जाती है। ... फिर काम शुरू होता है। तब तक महीनों और अरसा गुजर जाता है। काम पूरा होता है, गुणवत्ता जैसे शब्द अर्थहीन हो जाते हैं। 

      खैरागढ़ की धरती में इन दिनों निर्मल त्रिवेणी अभियान, श्री राम गोसेवा समिति, गोकुल नगर स्वयं सेवा समिति, संकल्प युवा क्रांति संगठन, पहल 'एक नई सोच', शांति दूत, इकरा फाउंडेशन जैसे कई अन्य सामाजिक संगठनों के सेवा कार्यों के सामने राजनीति बौनी साबित हो रही है।
             शहर के बीच से गुजरते स्टेट हाईवे के बगल में रंगी खूबसूरत दीवारें, छायादार व आयुर्वेद पौधों का रोपण हो। नदी व उसकी घाटों की सफाई व रंगाई हो। यह कार्य निर्मल त्रिवेणी अभियान पूरे शिद्दत से कर रहा है। शहर में वाहनों से दुर्घटनाग्रस्त घायल गायों की सेवा व उपचार की बात करें तो  पूरे जिले में  खैरागढ़ अग्रणी भूमिका निभा रहा है। जहां एक ओर सरकारी गो—शालाओं में सैकड़ों मवेशी भूख से मर जाते हैं वहां उमराव पूल के पास बने श्री राम गोसेवा समिति के गोशला में घाायल मवेशियों का ईलाज भी किया जा रहा है वहीं उन्हे पेट भर चारा भी खिलाया जा रहा है। नया ​टिकरापारा में सैकड़ों सालों से जर्जर मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए नेताओं ने पहल नहीं की लेकिन श्री राम गो सेवा समिति ने जन सहायोग से इसे पूरा करने जा रहा है। इस तरह से धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों को सहजने का काम भी वे बखूबी कर रहे हैं।  गोकुल नगर में स्वयं सेवा समिति लॉक डाउन में मोहल्ले के बच्चों को पढ़ाकर एक शानदार उदाहरण पेश कर रहे हैं। वहीं कोरोना के वैश्विक महामारी में पहल एक नई सोच व शांति दूत ने जैन समाज के सहयोग से गरीबों के लिए भोजन की व्यवस्था की। इकरा फाउंडेशन गरीब बच्चों को शिक्षा देने का अभियान छेड़े हुए है। 

         यही नहीं कई ऐसे भी संगठन और व्यक्ति विशेष  लोग है जो अपने सेवा कार्यों को सार्वजनिक करने की बजाय गोपनीय तरीके से समाज सेवा के कार्य में जूटे हुए हैं। गुजराती भोजनालय हो या कल्लू यादव... ये कोरोना कॉल जैसे संकट के दौर में निशुल्क भोजन पकाकर एक ​मिशाल पेश की है। पिपरि​या में नवजवानों का संगठन संकल्प युवा क्रांति संगठन भी अपने क्षेत्र में पर्यावरण और जनता की समस्याओं से जुड़े छोटी—छोटी समस्याओं के बड़ा होने से पहले उनके समाधान में अहम भूमिका निभा रहे हैं। 

               शहर की सरकार नगर पालिका परिषद के जनप्रतिधि व प्रशासनिक अमला चाहे तो शहर की बदहाल तस्वीर को बदल सकती है लेकिन इच्छाशक्ति के अभाव में कुछ नहीं कर पा रही है। सवाल यह भी उठता है कि जब महज एक—डेढ़ सालों में चंद सामाजिक संगठन आपसी सहयोग और श्रमदान कर शहर की तस्वीर बदल सकते हैं, तो पांच साल के लिए चुनकर आए नेता केवल सरकारी पैसों के भरोसे ही विकास करेंगे, यह सोचकर क्यों हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।

                      नगर पालिका प्रशासन अपने उत्तरदायित्व निभाने में फेल क्यों नजर आ रहा है। भ्रष्टाचार का दीमक पालिका को क्या ढक चुका है! जनप्रतिनिधि मौन साधे हुए है। अफसरों की मनमानी चल रही है। यह जरूर शुभ संकेत है कि समाजिक संगठन शहर के विकास के लिए आगे आ रहे हैं लेकिन नगर पालिका व जनप्रतिनिधियों के लिए यह चिंतन का विषय है कि वे जब जनता के प्रतिनिधि हैं तो वे क्यों जनता को साथ लेकर समाज कार्य में नहीं जूट रहे हैं। सच्चाई यही है कि जनप्रतिनिधियों के साथ केवल कार्यकर्ता जुड़े हैं। आम जनता अपने नेता का इंतजार कर रही है। वह अपना रहनुमा ढूंढ रही है। जनता अपने दर्द को बया नहीं कर पा रही है। सारी राजनीति मीडिया, सोशल मीडिया में ही दिख रही है। सड़कें सूनी है। सन्नाटा पसरा हुआ है। सब खामोश है। सिसकते लोगों को कोई सुनने वाला नहीं है। जनता के दर्द को उनकी समस्याओं को आवाज देने वाला कोई नेता नजर नहीं आ रहा है।

''राममनोहर लोहिया जी ने कहा था, अगर सड़कें खामोश हो गई्ं, तो संसद आवारा हो जाएगी।''

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