यूपी चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज, बहराइच में आज जनसभा करेंगे ओवैसी, मुस्लिम वोट बैंक पर नजर

उत्तर प्रदेश की 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने रविवार को बहराइच के मटेरा में जनसभा कर अपनी पार्टी का 2027 विधानसभा चुनाव की औपचारिक शुरुआत करेंगे. यह रैली मात्र एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि यूपी में AIMIM विधानसभा चुनाव की तैयारी से देखा जा रहा है. मटेरा विधानसभा सीट को चुनना रणनीतिक रूप से अहम है. यह क्षेत्र मुस्लिम, यादव, पिछड़े वर्गों और दलित मतदाताओं की अच्छी खासी आबादी वाला इलाका है, जहां 2012 से लगातार समाजवादी पार्टी का दबदबा रहा है. यहां यासर शाह और उनकी पत्नी मारिया शाह सपा के टिकट पर विधायक रह चुके हैं. 

असंतोष को वोट में बदलेंगे

AIMIM के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली का कहना है कि पार्टी 2027 में अकेले ही करीब 200 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की स्थिति में है. उन्होंने बसपा के साथ संभावित गठबंधन का भी संकेत दिया. उनका तर्क है कि मुस्लिम और दलित वोटों का संयुक्त आधार सपा और भाजपा दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है. ओवैसी ने मटेरा रैली के साथ सैयद सालार मसूद गाजी की दरगाह पर भी जाकर मुस्लिम समाज की सांस्कृतिक-धार्मिक भावनाओं से जुड़ने का संदेश देंगे. पार्टी का आरोप है कि दशकों तक मुस्लिम वोटों पर निर्भर रही पार्टियां समुदाय के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए कुछ ठोस नहीं कर पाईं. मटेरा जैसे इलाकों में आज भी बुनियादी सुविधाएं नदारद हैं.

सपा नेता यासर शाह का दावा है कि मुस्लिम मतदाता अब काफी जागरूक हो चुके हैं. किसी के झांसे में नहीं आने वाले हैं. वे जानते हैं कि AIMIM भाजपा के लिए काम करती, वहां विपक्षी वोट बंटे और भाजपा को फायदा पहुंचा. वैसे 2022 के चुनाव मे AIMIM इसका उदाहरण है. जहां जनता एक भी सीट नहीं दी. 

बिहार-महाराष्ट्र से मिला जोश, लेकिन UP अलग है

ओवैसी को बिहार के सीमांचल और महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में मिली सफलता ने आत्मविश्वास बढ़ाया है. हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक राजेंद्र कुमार इसे यूपी के लिए सीधे लागू नहीं मानते. उन्होंने कहा कि बिहार और महाराष्ट्र की सामाजिक संरचना यूपी से अलग है. यूपी के मतदाता विधानसभा चुनाव में विजेता की संभावना देखकर वोट डालते हैं, इसलिए छोटी पार्टियों के लिए रास्ता कठिन होता है.

आंकड़े क्या कहते हैं?

AIMIM का यूपी विधानसभा रिकॉर्ड अभी तक कमजोर रहा है. 2017 में 38 सीटों पर लड़कर 37 पर जमानत जब्त हुई. 2022 में करीब 100 सीटों पर लड़ने के बावजूद वोट शेयर महज 0.43% रहा. लेकिन, स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया 2017 में 29 सीटें और 2023 में पांच नगर पालिका परिषद सीटों पर जीत हासिल की.

सबसे ज्यादा चर्चा AIMIM-BSP गठबंधन की है. अगर मुस्लिम और दलित वोट एकजुट होते हैं तो कई सीटों पर समीकरण बदल सकता है. चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के साथ भी संभावित तालमेल की अटकलें लगाई जा रही हैं. हालांकि, मायावती गठबंधनों को लेकर बेहद सतर्क रहीं हैं. ओवैसी की रणनीति अब सपा के पारंपरिक गढ़ों तक फैल रहा है. इटावा में ई-रिक्शा अभियान के जरिए AIMIM ने सक्रियता बढ़ा दी है और इटावा सदर, भरथना, जसवंतनगर जैसी सीटों पर उम्मीदवार उतारने की तैयारी है.

AIMIM का टार्गेट क्या?

केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पवन दीक्षित का मानना है कि AIMIM का तत्काल लक्ष्य सरकार बनाना नहीं, बल्कि यूपी में स्थायी राजनीतिक आधार तैयार करना है. अगर पार्टी 3-5% वोट शेयर हासिल कर लेती है और मुस्लिम बहुल सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाती है, तो 2027 के चुनाव में कई करीबी मुकाबलों का रिजल्ट बदल सकता है. ओवैसी से सबसे ज्यादा दबाव समाजवादी पार्टी पर पड़ेगा, जो अपने मुस्लिम कोर वोट बैंक को बचाने की कोशिश में जुटी है.

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