
पश्चिमी एशिया में युद्ध का तनाव एक बार फिर एक्टिव हो गया है. जहां हर बीतते दिन के साथ हालात बदलते जा रहे हैं. कभी अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता और समझौते वाली खबरें आने लगती हैं. दावा किया जाता है कि बस डील होने ही वाली है तो कभी अचानक ही युद्ध वाला संकट गहराने लगता है. मिसाइलें गिरने लगती हैैं, ड्रोन उड़ने लगते हैं और बारूदी तबाही शुरू हो जाती है।
ऐसा ही पिछले 24 घंटे से हो रहा है. शांति के प्रयासों के बीच अचानक से बारूद की चिंगारी भड़क गई. एक तरफ ट्रंप सोशल मीडिया पर डील वाले दावे कर रहे थे. दूसरी तरफ होर्मुज स्ट्रेट में युद्ध वाला बटन ऑन कर रहे थे. अमेरिकी सेना ने होर्मुज स्ट्रेट के करीब दक्षिणी ईरान में कई हमले किए. ईरान के कई तटीय इलाकों को मिसाइलों से टारगटे किया. ये घटना बताती है कि ईरान को लेकर ट्रंप कंफ्यूजड हैं. उन्हें समझ नहीं आ रहा बातचीत से अपनी शर्तें मनवाएं या हथियारों की ताकत से ईरान को झुकाएं. आइए इस रिपोर्ट में जानते हैं कि आखिर अमेरिका और ईरान में कब तक और कैसे सकारात्मक बात बन सकती है.
बंदर अब्बास पोर्ट पर अमेरिका ने बरसाए गोले
असल में हुआ ये कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बिल्कुल पास ईरान की एक बहुत ही अहम रणनीतिक लोकेशन है. नाम है- बंदर अब्बास पोर्ट, जहां अमेरिका ने हमला किया. बताया जा रहा है कि यहां एक के बाद एक कई धमाके हुए. अमेरिकी हमलों के बाद ईरानी एयर डिफेंस एक्टिव हुआ. जिससे धमाके की आवाज सुनी गई. IRGC की तरफ से भी बंदर अब्बास में 3 धमाकों की पुष्टि की गई. बताया जाता है कि ये ईरान का सबसे अहम नेवल बेस है. इसके अलावा सिरिक और जास्क में भी धमाके हुए. जहां ईरानी स्पीड बोट्स को टारगेट किया गया. लराक आइलैंड पर भी अमेरिका ने हमला किया.
इस हमले में 2 ईरानी स्पीड बोट्स तबाह हो गई. यहां मिसाइल लॉन्च साइट पर भी अटैक की खबर है. इस हमलों में IRGC के 4 सैनिक मारे गए हैं. अमेरिका ने हमले की बात स्वीकार की है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड की तरफ से कहा गया कि ये हमला आत्मरक्षा में किया गया. क्योंकि ईरान स्पीड बोट के जरिए माइंस बिछा रहा था. अमेरिका ने ईरान ने जिन इलाकों पर हमला किया वहां ईरान के अंडरग्राउंड मिसाइल ठिकाने हैं. साथ ही यहां बड़ी संख्या में सैन्य बोट हैं. जो SACAD C 802 मिसाइलों से लैस हैं.
अमेरिकी हमलों के बाद ईरान का पलटवार
अमेरिकी हमलों के बाद से ईरान भड़का हुआ है. ईरान का दावा है कि इन हमलों का माकूल जवाब दिया गया है. ईरान ने दावा किया कि अमेरिकी वॉरशिप पर मिसाइल दागीं गई. US के F-35 फाइटर जेट्स पर भी हमला किया गया. ईरान का दावा है कि हमले के बाद अमेरिका फाइटर जेट भाग गए. साथ ही फारस की खाड़ी में एक ड्रोन मार गिराने का दावा किया. दावा है कि ये MQ9 ड्रोन केश्म द्वीप के पास गिराया गया. ईरान ने बताया कि इस ड्रोन को ‘आराश-ए-कमांगिर’ सिस्टम से गिराया है. ड्रोन गिराने के लिए ईरान ने इस नए सिस्टम को बनाया है. IRGC ने इसके बाद चेतावनी देते हुए कहा कि अमेरिका अगर सीजफायर को तोड़ता है, तो ईरान को जवाबी कार्रवाई करने का हक है.
कतर में अमेरिका और ईरान के बीच होगा समझौता
क्या अमेरिका और ईरान के बीच जल्द कोई समझौता हो सकता है. या फिर अब वक्त सबसे बड़े सर्वनाश का है. इन सवालों का जवाब कतर में तलाशा जा रहा है जहां ईरानी वार्ताकार मौजूद हैं. अमेरिकी वार्ताकार भी यहां आ सकते हैं. लेकिन इसी बीच ईरान के बंदर अब्बास में अमेरिका की तरफ से विध्वंसक प्रहार किए गए. उधर अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की तरफ से बड़ा दावा किया जा रहा है. दावे के मुताबिक ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई अज्ञात जगह पर छिप गए हैं. यानी मुज्तबा की हर हलचल की जानकारी जुटा ली गई है. ऐसे में सवाल है. क्या अब अमेरिका के टारगेट पर मुज्तबा खामनेई हैं. ये तो आगे पता चलेगा. लेकिन तय है तो ये कि अमेरिका ईरान वार्ता से पाकिस्तान का पत्ता साफ हो चुका है.
अमेरिका बार-बार क्यों कर रहा सीजफायर का उल्लंघन
सीजफायर के बीच इससे पहले भी अमेरिका की तरफ से ईरान पर हमला किया जा चुका है. इसी महीने 3-4 मई को अमेरिका ने ईरान के कुछ द्वीपों और तटीय इलाकों पर हमला किया था. ऐसे में ये सवाल है कि आखिर अमेरिका की तरफ से बार-बार सीजफायर का उल्लंघन क्यों किया जा रहा है. क्या ट्रंप इन छोटे हमलों के जरिए मिनी वॉर की स्थिति पैदा कर ईरान पर दबाव बनाना चाहते हैं, या फिर वो ईरान पर हमला कर उसे उकसाना चाहते हैं, ताकि फिर से बड़ा युद्ध छेड़ने का बहाना मिल जाए.
एक वजह ये भी हो सकती है कि ट्रंप इन हमलों के जरिए इजराइल और अरब सहयोगियों का विश्वास जीतना चाहते हैं, उन्हें ये बताना चाहते हैं कि ईरान को कोई ढील नहीं दी जाएगी. साथ ही ट्रंप ईरान वॉर में फंसे होने का नैरेटिव तोड़ना चाहते हैं, खुद को एक मजबूत छवि का नेता दिखाना चाहते हैं. यही वजह है ट्रंप ने बातचीत और समझौते वाली चर्चा के बीच भी ईरान पर हमले को हरी झंडी दे दी. ट्रंप इन हमलों से ईरान को ये भी बताना चाहते हैं कि अमेरिका किसी भी वक्त हमले के लिए तैयार है. अगर दोहा में चल रही वार्ता में ईरान ने शर्तें नहीं मानी तो परिणाम बुरे हो सकते हैं.
अमेरिका को चाहिए संवर्धित यूरेनियम
अमेरिका के लिए सबसे बड़ा मुद्दा संवर्धित यूरेनियम का है. अमेरिका ये कह चुका है यूरेनियम सरेंडर किए बिना समझौता नहीं होगा. जबकि ईरान में इसको लेकर अभी कोई सहमति नहीं बन पाई है. बताया जा रहा है कि अमेरिका इस बात के राजी है कि ईरान यूरेनियम किसी परमाणु शक्ति वाले देश को सौंप दे. लेकिन IRGC का रूख इसको लेकर अभी भी सख्त है.
यूरेनियम के अलावा ईरान होर्मुज पर कंट्रोल और टोल वसूली का अधिकार चाहता है. साथ ही ईरान ने उसकी जब्त सपंतियों को मुक्त करने की मांग रखी है. इसके लिए भी ट्रंप अभी सहमत नहीं दिख रहे हैं. हांलाकि सऊदी मीडिया का दावा है कि ईरान यूरेनियम को किसी दूसरे देश भेजने पर विचार कर रहा है. इसके लिए ईरान रूस और चीन के विकल्प पर विचार कर रहा है. दोनों देशों से उसकी बातचीत हो रही है.
ट्रंप बोले- ईरान बैकफुट पर है
इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने इसको लेकर सोशल ट्रूथ पर लंबा पोस्ट लिखा. जिसमें न्यूक्लियर डस्ट शब्द का इस्तेमाल करते हुए ईरान को चेतावनी दी. ट्रंप ने लिखा कि ईरान यूरेनियम सौंपे और उसे अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी की निगरानी में नष्ट किया जाए. इन बयानों के जरिए ट्रंप ये बताना चाहते हैं कि ईरान बैकफुट पर है. और समझौते के लिए तैैयार है. लेकिन ईरान से ऐसे संकेत नहीं मिल रहे हैं. सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई ने एक बार फिर अमेरिका को धमकी दी.
खामेनेई ने इजरायल पर प्रहार करते हुए कहा कि अब इजराइल अपने अंत की ओर जा रहा है. साथ ही पश्चिमी एशिया में अमेरिका अपनी ताकत खो रहा है. खामेनेई ने कहा कि अब खाड़ी देश अमेरिकी बेस की रक्षा नहीं कर पाएंगे”. ईरान ने युद्ध के दौरान अमेरिका-इजराइल पर जीत हासिल की.
अमेरिका होर्मुज को पूरी तरह से खोलने पर अड़ा
अमेरिका विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा, होर्मुज पूरी तरह खुला रहना चाहिए चाहे किसी भी तरीके से खुले. उसका खुला रहना जरूरी है. वहां जो हो रहा है वो गैर-कानूनी है, अवैध है. दुनिया के लिए अस्थिर करने वाला है और अस्वीकार्य है. उन्होंने कहा कि रूस टोल सिस्टम के पक्ष में नहीं है, चीन भी टोल सिस्टम के पक्ष में नहीं है. दुनिया में ईरान की सरकार को छोड़कर कोई भी देश टोल के समर्थन में नहीं है. इसलिए ये स्वीकार्य नहीं है, ऐसा नहीं हो सकता. होर्मुज बिना किसी रुकावट और बिना टोल के खुले रहने चाहिए. जैसे ही कोई समझौता होता है, ये तुरंत लागू होना चाहिए.
ईरान राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने का करेगा प्रयास
ईरान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई कहते हैं कि हम अमेरिका की ओर से अलग-अलग और विरोधाभासी बयान देखते है जिससे किसी भी बातचीत में समस्या पैदा होती है. फिर भी हम कूटनीति के क्षेत्र में उसी दृढ़ता के साथ कार्य करेंगे जैसा हमने युद्ध के दौरान दिखाया था. खुली आंखों से और पिछले अनुभवों को ध्यान में रखते हुए हम ईरान के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने का प्रयास करेंगे.
ईरान के फैसले पर निर्भर पर अमेरिकी कार्रवाई
USS कोल पूर्व कमांडिंग ऑफिसर कर्क लिपोल्ड का कहना है कि मुझे लगता है कि अमेरिका पूरी तरह तैयार और कार्रवाई के लिए तत्पर है. जो भी जरूरी होगा उसके लिए हम तैयार हैं. विदेश मंत्री मार्को रुबियो कूटनीतिक रास्ते से समाधान निकालने की कोशिश करेंगे और प्रशासन पर ज्यादा से ज्यादा दबाव डालेंगे जिससे कि उसी दिशा में आगे बढ़ा जाए. मेरा मानना है कि आखिर में अमेरिका को फिर से सैन्य कार्रवाई शुरू करनी पड़े, ऐसी स्थिति के लिए तैयार है. तो ऐसे हालात में अमेरिका का जवाब बेहद कठोर और शक्तिशाली होगा और ये सब ईरान के फैसले पर निर्भर करेगा.
युद्ध के हरेक उद्देश्य को हासिल करने में विफल नेतन्याहू
इजराइल के विपक्ष के नेता येर लैपिड का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौते का विवरण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, ये बेहद चिंताजनक है. जो जानकारी सामने आ रही है, उसके अनुसार ये समझौता इजराइल के लिए खराब है, क्षेत्र के लिए खराब है और ईरान के नागरिकों के लिए भी खराब है. इस समझौते का मतलब दो बातें हैं पहला तो ये कि ये युद्ध का आखिरी दौर नहीं होगा.दूसरा बेंजामिन नेतन्याहू अपने तय किए गए युद्ध के हरेक उद्देश्य को हासिल करने में विफल रहे हैं.
पाकिस्तान के लिए बुरी खबर
इस तनाव के बीच पाकिस्तान के लिए एक बुरी खबर है. अमेरिका-ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका से पाकिस्तान अब करीब करीब बाहर हो चुका है. अमेरिका-ईरान बातचीत में अब कतर सक्रिय तरीके से शामिल है. बातचीत के लिए ईरानी वार्ताकार कतर में हैं. ईरानी संसद के स्पीकर कालीबाफ और विदेश मंत्री अरागची कतर के प्रधानमंत्री से मिलेंगे. जहां अमेरिका के साथ समझौते पर बात होगी. लेकिन ये बात पाकिस्तान को परेशान कर सकती है. क्योंकि मध्यस्थ के तौर पर अब कतर को ज्यादा तरजीह मिल रही है. ईरान अब कतर के जरिए बातचीत आगे बढ़ना चाहता है. इसका एक पक्ष ये भी है कि ईरान को अब पाकिस्तान पर ज्यादा भरोसा नहीं है.